"सरकारी" और "प्राइवेट"


                                       

                                                         "सरकारी" और "प्राइवेट"

"सरकारी" और "प्राइवेट" केवल नौकरियों के लिए इस्तेमाल होने वाले जुमले नहीं हैं . ये दो ज़िन्दगी जीने के ढर्रे हैं , दो विचारधाराएँ हैं , दो मनोदशाएँ हैं .
हमारे कॉलेज का एक मित्र सरकारी सोच वाला था . ढीले ढाले कपड़े , ढीली ढाली दिनचर्या और ढीली ढाली सोच . कॉलेज की लगभग सभी लडकियां उन्हें अच्छी लगतीं थीं . बैचमेट , सीनियर और जूनियर तो मिथ्या वर्गीकरण की श्रेणियां भर थीं . उनके सरकारी मन को जी.एच के हर कमरे में प्रेयसी दिखी . मगर इश्क की फ़ाइल कुछ इतना धीरे धीरे खिसकी कि उन सभी से मुलाक़ात हकीकत या तो बन नहीं पायी या आज कल बच्चों और पतियों के साथ होती है .
हमारे दोस्त की अरेंज्ड शादी हुई . ज्यादातर सरकारी सोच वालों की ज़िन्दगी इसी रास्ते आगे बढ़ती है . भाभीजी एकदम प्राइवेट विचारधारा की थीं . हमेशा "हेप" बनकर घूमतीं थीं . पत्नीपना उनके अन्दर झलका ही नहीं . हमेशा वे हमारे सरकारी दोस्त की प्रेमिका बन कर रहीं . चुस्त कपड़े , चुस्त बातें और बातों के चुस्त जवाब .
मैंने एक दिन भाभीजी से पूछा ; आपको इस "रोडवेज की बस" में क्या दिखा ? उन्होंने कहा रोडवेज का निजीकरण विकास के लिए ज़रूरी है . यही विकास की चाह हमारी शादी की वजह बनी .
मेरे मज़ाक का उन्होंने सटीक जवाब दिया था .
लेकिन जब मैं गंभीरता से सोचता हूँ तो मुझे निजीकरण और पूंजीवाद थोड़े ज्यादा जनाना और सरकारी तंत्र और समाजवाद थोड़े ज्यादा मरदाना नज़र आते हैं .
ऐसा नहीं है कि मैं किसी एक का पक्षधर हूँ . पर शायद हर मर्दानगी के आलसी और "रस्टिक" पहलू ज़रूर हैं ...

डॉ.  स्कन्द शुक्ल 

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