सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

स्त्रियाँ तीन तरह की होती हैं

स्त्रियाँ तीन तरह की होती हैं

"स्त्रियाँ तीन तरह की होती हैं ; कन्या , पुनर्भू और वेश्या ।" पंडितजी चिन्तामणि को समझा रहे थे । "जिसने कभी पुरुष-संसर्ग न किया हो वह कन्या, जिसने एक से किया हो वह पुनर्भू और जिसने एक से ज़्यादा पुरुषों से किया हो वह वेश्या होती है ।"
"यानी पूरी मादा बिरादरी का बँटवारा चमड़ी से भी पतली केवल एक झिल्ली पर । बड़ा ओवरसिंपलिस्टिक क्लासिफिकेशन है । हाउ सिंम्पल एंथ्रोपोमेट्री ! नरों के वर्गीकरण की तरह नस्ल , धर्म , जाति वगैरह की कोई ज़रूरत ही नहीं ।" चिन्तामणि ने जवाब दिया ।
"यौनकर्मों से स्त्री के चरित्र का निर्धारण किया जा सकता है , ऐसा इसलिए है ।"
"मगर सेक्स स्त्री अकेले तो नहीं कर सकती , तो उसी का गुप्तांग-आधारित वर्गीकरण क्यों ? "
"शास्त्रों की जो इच्छा ! उनपर उँगली उठाना अच्छी बात नहीं ।" पंडितजी के स्वर में रुखाई थी ।
" और अगर साइकिल चलाने पर या बास्केटबाल खेलने पर योनि क्षत हो जाए तो ? या किसी का गैंगरेप हो जाए तो?" चिन्तामणि ने पूछा ।
पंडितजी ने किलसकर मौन थामा । उनके शास्त्र लिखने वालों को सद…
हाल की पोस्ट

कल... आज... कल...

कल... आज... कल...

"शाबजी ! आपको पता है 'शीताजी' हमरे नेपाल का था।" बहादुर मेज पर 'सावल' लगाते हुए कहता है।
कार्तिक ढाबा हमारे दफ़्तर के पास ही था जहाँ मैं और सुनील अक्सर दोपहर में खाना खाने आते थे। कभी-कभी कैंटीन के खाने से मन उकता जो जाता है। शर्मा अंकल का वह ढाबा , नेपाली कर्मचारियों से भरा हुआ था। बहादुर उन्हीं में से एक था। बातूनी होने के कारण उसे हमारी बातों में रस मिलता था और वार्त्तालाप में हमें उसकी उपस्थिति , 'फॉर अ चेंज' , खलती नहीं थी। "पता है चिन्तू , अब कन्फर्म हो गया है कि आर्य यहीं के थे , बाहर से नहीं आये थे।" सुनील अखबार पलटते हुए बोला। हाल में ही एक अँगरेज़ी पत्र में तथाकथित 'आर्य-आक्रमण' पर एक विशद लेख छपा था , वह उसी के सन्दर्भ में बात कर रहा था।
" 'यहीं' का क्या मतलब है ? और 'बाहर' का ? " मैंने पूछा।
सुनील को सवाल कैज़ुअल लगा और उसने आधा जवाब देते हुए कहा , - "यहीं मतलब ये देश। भारत। इंडिया।"
"यह देश सदा से इतना ही कब रहा है सुनील ? और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि यह देश ही कब रहा है…

मरीज... ऑब्जेक्ट... सब्जेक्ट...

मरीज... ऑब्जेक्ट... सब्जेक्ट...

सुशान्त सस्पेंड कर दिया गया था , डिपार्टमेंट से। न ओपीडी में दिखोगे तीन हफ़्तों तक , न वॉर्ड में और न ओटी में।जाओ। बैठो हॉस्टल में और घूमो चाय के अड्डों पर।
"जिन को बोतल में बन्द कर दिया गया है।" मैंने उससे कहा था।
"क्या बॉस , आप भी मज़े लेंगे ?" उसके स्वर में किलसन थी।
"डॉक्टर जिन नहीं हैं ? पब्लिक तो उनको वही समझती है ? भगवान तो अब आउटडेटेड संज्ञा हो गयी है , बेटा।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
"पब्लिक साली क्या समझे कि हमपर क्या बीतती है ? केबल पर 'संजीवनी' देखने वाले लोग हैं बॉस ये लोग , डॉक्टरों को मॉडल समझते हैं। इन्हें हमारा बिना दस्तानों के पट्टी करना नहीं दिखता ; कॉलेज गेट पर हमारा चाय पीना दिखता है।"
"तो समझाओ उन्हें ? मेरी समझ से डॉक्टरों की तरफ से भी कमी है यहाँ। हमें अपने प्रोफेशन की ग्लैमरस छवि पर खुश नहीं होना चाहिए , यह तो मीठा ज़हर है। इससे समाज हमारे प्रति ईर्ष्यालु होता है। जेलसी पैदा होती लोगों में।
कभी मीडिया का कैमरा हॉस्टलों की तरफ मुड़वाओ जहाँ लड़के-लड़कियाँ 'लव एंड बेली' खोलकर रतजगे क…

पित्त और पित्ती

पित्त और पित्ती  'पित्त' शब्द से मिलता-जुलता एक शब्द हिन्दी में 'पित्ती' भी है। त्वचा पर उभरने वाले विविध आकार और आकृति के खुजलीदार दानों को कई बार पित्ती कहा जाता है। ये दाने कई बार नन्हें गोलाकार होते हैं , तो कई बार इनके आकार बढ़कर और परस्पर मिलकर बड़े और तरह-तरह के हो जाते हैं। ये कुछ घण्टों तक त्वचा पर उभरे हुए रहते हैं , फिर ग़ायब हो जाते हैं। फिर किसी नये स्थान पर ये दोबारा उभरते हैं। इन दानों की संख्या कुछ से लेकर बहुत ज़्यादा तक हो सकती है। यकृत-रोगों के तमाम लक्षणों में एक खुजली होनाभी है। यह खुजली यकृत के उन रोगों में विशेष रूप से दिखायी देती है , जिनमें पित्त का प्रवाह यकृत से नीचे आँत को रुक जाता है। नतीजन पित्त नीचे नहीं उतर पाता और उसकी बढ़ी मात्रा उलटा ख़ून में पहुँचने लगती है।
इस पित्त के शरीर के तमाम अंगों में जमा होने से पीलिया का जन्म होता है। यह पीलापन दरअसल पित्त में उपस्थित पित्त-रंजक बिलीरूबिन के कारण होता है। लेकिन इस स्थिति में खुजली भी देखने को मिलती है। ऐसा माना जाता है कि यह खुजली पित्त-लवणों के शरीर में अंगों में जमा होने के कारण होती है। पित्त-प्रवा…

होल-बॉडी-एमआरआई

होल-बॉडी-एमआरआई तो क्यों न होल-बॉडी-एमआरआई करा लिया जाए ! वे रोगी हैं और सबसे बड़ा दुर्भाग्य अब तक यह है कि उनका रोग अज्ञात है। अज्ञात रोग बहुधा ठीक होने में समस्या उत्पन्न करते हैं। ऐसे में उनके दूर के फूफा जी जो लहीम-शहीम हैं , एक त्वरित प्रस्ताव देते हैं : "क्यों न होल-बॉडी-एमआरआई करा लिया जाए !" आम आदमी के मस्तिष्क में एमआरआई सबसे महँगा धन-संज्ञान जगाता है। वह एक सुरंग है जो कई हज़ार रुपये पी लेती है। लेकिन वह सभी डायग्नोस्टिक विधाओं में वरिष्ठा है। वह जो बता सकती है , कोई अन्य जाँच नहींबता सकती। वह जिस गोपन का उद्घाटन कर देती है , किसी अन्य मशीन के वश का भला कहाँ ! निश्चय ही एमआरआई महत्त्वपूर्ण है , लेकिन क्या एक्सरे की जाँच अब बेकार हो चुकी है ? या फिर अल्ट्रासाउण्ड का कमतर महत्त्व है ? या फिर सीटी के जाने की सीटी बज चुकी है ? यहीं वह सबसे बड़ी चूक होती है , जिसके लिए रोगी के धन का व्यय उत्तरदायी है। चिकित्सा के क्षेत्र में एक्स-रे , अल्ट्रासाउण्ड , सीटी , एमआरआई या अन्य कोई भी जाँच अपना-अपना महत्त्व रखती है। हर जाँच की अपनी पहुँच है

चेहरा ये बदल जाएगा : एलेक्ट्रॉन-कथा --- भाग 1

चेहरा ये बदल जाएगा : एलेक्ट्रॉन-कथा --- भाग 1 जुरासिक पार्क फ़िल्म देखी है आपने ? याद कीजिए वह दृश्य जिसमें एक शहद के रंग की आकृति में एक मृत मच्छर को क़ैद दिखाया जाता है। मच्छर जिसके डीएनए का इस्तेमाल वैज्ञानिक डायनासॉरों को पुनर्जीवित करने के लिए करते हैं। वह गोंदनुमा पदार्थ ऐम्बर कहलाता है। तमाम लकड़ीदार पेड़ों से रिसने वाला एक गाढ़ा चिपचिपा द्रव , जिसे मनुष्य सदियों से जानता और इस्तेमाल करता रहा है। इस द्रव के पेड़ों के लिए कई लाभ हैं , यह उन्हें तमाम कीड़ों औरपरजीवियों से बचाता है। यह कुदरत के द्वारा उन्हें चोटों-घावों के लिए दी गयी मलहमी पट्टी है।
लेकिन हम यहाँ पादप-विज्ञान में नहीं प्रवेश कर रहे और न हमें ऐम्बर के रासायनिक गुणों में कोई तात्कालिक रुचि है। हम तो बस यह बात ठहर कर जानने के इच्छुक हैं कि ऐम्बर का एक नाम एलेक्ट्रॉन भी है। जी हाँ ! प्राचीन यूनान में अगर आप एलेक्ट्रॉन की बात छेड़ेंगे तो वह व्यक्ति आपसे पेड़ के गोंद की ही बात करेगा , किसी परमाणु के कण-इत्यादि की नहीं।
कथा यह है कि जब सूर्य-पुत्र फ़ीटन मारा गया तो उसकी बहनें गोंददार पेड़ों में बदल गयीं और उनके गाढ़े आँसू बन गये एलेक्ट्…

रिस्क-फ़ैक्टर

रिस्क-फ़ैक्टर कैंसर के ढेरों प्रचलित शब्दों में एक महत्त्वपूर्ण शब्द 'रिस्क-फ़ैक्टर' भी है। आपको बताया जाता है कि तम्बाकू पीने-खाने से कैंसर होता है : वस्तुतः तब विज्ञान आपसे यही कहना चाहता है कि तम्बाकू पीने-खाने से कैंसर का रिस्क न पीने-खाने वाले व्यक्ति की तुलना में बढ़ जाता है। तम्बाकू पीने-खाने से एक ही अंग का कैंसर नहीं होता , कई अलग-अलग अंगों के कैंसर हो सकते हैं। सो उन सबके रिस्क भी एक न होकर अलग-अलग हुए। विज्ञान में कट्टर विज्ञानवाद की भी एक धारा है। ये लोग विज्ञान के प्रति गहन अनुराग रखते हैं ( आस्था नहीं कहूँगा ! ) और चाहते हैं कि किसी भी तरह विज्ञान के प्रचार-प्रसार में लचर शब्दावली का प्रयोग न किया जाए। यथासम्भव विज्ञान को इतिवृत्तात्मक रखा जाए , उसे अभिधा में कहा-लिखा जाए। समझने वाले समझ सकें तो समझें , न समझ सकें तो न सही।
विज्ञान के प्रति कट्टर विज्ञानवादियों से पूर्ण असहमति मैं नहीं रखता। सत्य का निकटतम स्वरूप वही है , जिस रूप में वे उसे जानते हैं और प्रस्तुत करना चाहते हैं। लेकिन देने वाला चाहे जिस रूप में ज्ञान देना चाहे , केवल दायी के गुणधर्म से दान-धर्म सम्पूर्ण …